Phone Number Format

US Phone Number Format

Understanding the structure of American phone numbers with focus on the first 6 digits: Area Code + Central Office Code (NXX)

(360) 978-xxxx Area Code: 360 CO Code: 978
State Wa
Primary City ONALASKA
Carrier Mcdaniel Telephone Co.
Usage Landline
Introduced 02/11/1995

Area Code (First 3 Digits)

The geographic identifier for phone numbers in North America

Geographic Significance

Originally designed to identify specific regions like New York (212), Los Angeles (213), or Chicago (312).

Numbering Rules

First digit 2-9 (avoids special services), second digit 0-9 (cannot match first), third digit 0-9.

Modern Usage

With mobile phones and number portability, area codes no longer strictly indicate geographic location.

Central Office Code (NXX)

The next 3 digits identifying the local exchange

Structure

The Central Office Code (also called exchange code or NXX) follows the area code and consists of:

  • First digit (N): 2-9 (cannot be 0 or 1)
  • Second digit (X): 0-9
  • Third digit (X): 0-9

Function

Originally identified specific telephone exchanges (physical switching centers) serving particular neighborhoods.

The famous "555" exchange is reserved for fictional use (movies, TV) to avoid misdialing real numbers.

Complete 10-Digit Format

How the first 6 digits fit into the complete US phone number structure

Standard US Phone Number

1
Country Code
+1 (Optional for domestic calls)
360
Area Code
Identifies geographic region
978
Central Office Code
Identifies local exchange
0199
Line Number
Unique subscriber identifier
Common Display Formats
  • (360) 978-0199 (Standard)
  • 360-978-0199 (Hyphenated)
  • 3609780199 (All digits)
  • +1 360 978 0199 (International)
When dialing internationally, the US country code (+1) must be included.

Example Numbers

All 10,000 possible numbers in 360978 — fully indexed for search

(360) 978-0000 (360) 978-0001 (360) 978-0002 (360) 978-0003 (360) 978-0004 (360) 978-0005 (360) 978-0006 (360) 978-0007 (360) 978-0008 (360) 978-0009 (360) 978-0010 (360) 978-0011 (360) 978-0012 (360) 978-0013 (360) 978-0014 (360) 978-0015 (360) 978-0016 (360) 978-0017 (360) 978-0018 (360) 978-0019 (360) 978-0020 (360) 978-0021 (360) 978-0022 (360) 978-0023 (360) 978-0024 (360) 978-0025 (360) 978-0026 (360) 978-0027 (360) 978-0028 (360) 978-0029 (360) 978-0030 (360) 978-0031 (360) 978-0032 (360) 978-0033 (360) 978-0034 (360) 978-0035 (360) 978-0036 (360) 978-0037 (360) 978-0038 (360) 978-0039 (360) 978-0040 (360) 978-0041 (360) 978-0042 (360) 978-0043 (360) 978-0044 (360) 978-0045 (360) 978-0046 (360) 978-0047 (360) 978-0048 (360) 978-0049 (360) 978-0050 (360) 978-0051 (360) 978-0052 (360) 978-0053 (360) 978-0054 (360) 978-0055 (360) 978-0056 (360) 978-0057 (360) 978-0058 (360) 978-0059 (360) 978-0060 (360) 978-0061 (360) 978-0062 (360) 978-0063 (360) 978-0064 (360) 978-0065 (360) 978-0066 (360) 978-0067 (360) 978-0068 (360) 978-0069 (360) 978-0070 (360) 978-0071 (360) 978-0072 (360) 978-0073 (360) 978-0074 (360) 978-0075 (360) 978-0076 (360) 978-0077 (360) 978-0078 (360) 978-0079 (360) 978-0080 (360) 978-0081 (360) 978-0082 (360) 978-0083 (360) 978-0084 (360) 978-0085 (360) 978-0086 (360) 978-0087 (360) 978-0088 (360) 978-0089 (360) 978-0090 (360) 978-0091 (360) 978-0092 (360) 978-0093 (360) 978-0094 (360) 978-0095 (360) 978-0096 (360) 978-0097 (360) 978-0098 (360) 978-0099 (360) 978-0100 (360) 978-0101 (360) 978-0102 (360) 978-0103 (360) 978-0104 (360) 978-0105 (360) 978-0106 (360) 978-0107 (360) 978-0108 (360) 978-0109 (360) 978-0110 (360) 978-0111 (360) 978-0112 (360) 978-0113 (360) 978-0114 (360) 978-0115 (360) 978-0116 (360) 978-0117 (360) 978-0118 (360) 978-0119 (360) 978-0120 (360) 978-0121 (360) 978-0122 (360) 978-0123 (360) 978-0124 (360) 978-0125 (360) 978-0126 (360) 978-0127 (360) 978-0128 (360) 978-0129 (360) 978-0130 (360) 978-0131 (360) 978-0132 (360) 978-0133 (360) 978-0134 (360) 978-0135 (360) 978-0136 (360) 978-0137 (360) 978-0138 (360) 978-0139 (360) 978-0140 (360) 978-0141 (360) 978-0142 (360) 978-0143 (360) 978-0144 (360) 978-0145 (360) 978-0146 (360) 978-0147 (360) 978-0148 (360) 978-0149 (360) 978-0150 (360) 978-0151 (360) 978-0152 (360) 978-0153 (360) 978-0154 (360) 978-0155 (360) 978-0156 (360) 978-0157 (360) 978-0158 (360) 978-0159 (360) 978-0160 (360) 978-0161 (360) 978-0162 (360) 978-0163 (360) 978-0164 (360) 978-0165 (360) 978-0166 (360) 978-0167 (360) 978-0168 (360) 978-0169 (360) 978-0170 (360) 978-0171 (360) 978-0172 (360) 978-0173 (360) 978-0174 (360) 978-0175 (360) 978-0176 (360) 978-0177 (360) 978-0178 (360) 978-0179 (360) 978-0180 (360) 978-0181 (360) 978-0182 (360) 978-0183 (360) 978-0184 (360) 978-0185 (360) 978-0186 (360) 978-0187 (360) 978-0188 (360) 978-0189 (360) 978-0190 (360) 978-0191 (360) 978-0192 (360) 978-0193 (360) 978-0194 (360) 978-0195 (360) 978-0196 (360) 978-0197 (360) 978-0198 (360) 978-0199 (360) 978-0200 (360) 978-0201 (360) 978-0202 (360) 978-0203 (360) 978-0204 (360) 978-0205 (360) 978-0206 (360) 978-0207 (360) 978-0208 (360) 978-0209 (360) 978-0210 (360) 978-0211 (360) 978-0212 (360) 978-0213 (360) 978-0214 (360) 978-0215 (360) 978-0216 (360) 978-0217 (360) 978-0218 (360) 978-0219 (360) 978-0220 (360) 978-0221 (360) 978-0222 (360) 978-0223 (360) 978-0224 (360) 978-0225 (360) 978-0226 (360) 978-0227 (360) 978-0228 (360) 978-0229 (360) 978-0230 (360) 978-0231 (360) 978-0232 (360) 978-0233 (360) 978-0234 (360) 978-0235 (360) 978-0236 (360) 978-0237 (360) 978-0238 (360) 978-0239 (360) 978-0240 (360) 978-0241 (360) 978-0242 (360) 978-0243 (360) 978-0244 (360) 978-0245 (360) 978-0246 (360) 978-0247 (360) 978-0248 (360) 978-0249 (360) 978-0250 (360) 978-0251 (360) 978-0252 (360) 978-0253 (360) 978-0254 (360) 978-0255 (360) 978-0256 (360) 978-0257 (360) 978-0258 (360) 978-0259 (360) 978-0260 (360) 978-0261 (360) 978-0262 (360) 978-0263 (360) 978-0264 (360) 978-0265 (360) 978-0266 (360) 978-0267 (360) 978-0268 (360) 978-0269 (360) 978-0270 (360) 978-0271 (360) 978-0272 (360) 978-0273 (360) 978-0274 (360) 978-0275 (360) 978-0276 (360) 978-0277 (360) 978-0278 (360) 978-0279 (360) 978-0280 (360) 978-0281 (360) 978-0282 (360) 978-0283 (360) 978-0284 (360) 978-0285 (360) 978-0286 (360) 978-0287 (360) 978-0288 (360) 978-0289 (360) 978-0290 (360) 978-0291 (360) 978-0292 (360) 978-0293 (360) 978-0294 (360) 978-0295 (360) 978-0296 (360) 978-0297 (360) 978-0298 (360) 978-0299 (360) 978-0300 (360) 978-0301 (360) 978-0302 (360) 978-0303 (360) 978-0304 (360) 978-0305 (360) 978-0306 (360) 978-0307 (360) 978-0308 (360) 978-0309 (360) 978-0310 (360) 978-0311 (360) 978-0312 (360) 978-0313 (360) 978-0314 (360) 978-0315 (360) 978-0316 (360) 978-0317 (360) 978-0318 (360) 978-0319 (360) 978-0320 (360) 978-0321 (360) 978-0322 (360) 978-0323 (360) 978-0324 (360) 978-0325 (360) 978-0326 (360) 978-0327 (360) 978-0328 (360) 978-0329 (360) 978-0330 (360) 978-0331 (360) 978-0332 (360) 978-0333 (360) 978-0334 (360) 978-0335 (360) 978-0336 (360) 978-0337 (360) 978-0338 (360) 978-0339 (360) 978-0340 (360) 978-0341 (360) 978-0342 (360) 978-0343 (360) 978-0344 (360) 978-0345 (360) 978-0346 (360) 978-0347 (360) 978-0348 (360) 978-0349 (360) 978-0350 (360) 978-0351 (360) 978-0352 (360) 978-0353 (360) 978-0354 (360) 978-0355 (360) 978-0356 (360) 978-0357 (360) 978-0358 (360) 978-0359 (360) 978-0360 (360) 978-0361 (360) 978-0362 (360) 978-0363 (360) 978-0364 (360) 978-0365 (360) 978-0366 (360) 978-0367 (360) 978-0368 (360) 978-0369 (360) 978-0370 (360) 978-0371 (360) 978-0372 (360) 978-0373 (360) 978-0374 (360) 978-0375 (360) 978-0376 (360) 978-0377 (360) 978-0378 (360) 978-0379 (360) 978-0380 (360) 978-0381 (360) 978-0382 (360) 978-0383 (360) 978-0384 (360) 978-0385 (360) 978-0386 (360) 978-0387 (360) 978-0388 (360) 978-0389 (360) 978-0390 (360) 978-0391 (360) 978-0392 (360) 978-0393 (360) 978-0394 (360) 978-0395 (360) 978-0396 (360) 978-0397 (360) 978-0398 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